Karva Chauth 2018 Vrat Katha Puja Udyapan Vidhi In Hindi

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करवा चौथ हिन्दु औरतों का विषेस व्रत है। यह व्रत वे अपने पति की लंबी उम्र के लिए रखती है। यह भारत के कई राज्यों में मनाया जाता है यह भारत के उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश का पर्व है। यह कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह पर्व शादी सुदा स्त्री मनाती है। यह व्रत सुबह सूर्य निकलने से पहले 4 बजे के बाद शुरु होकर रात में चांद को देखने के बाद सम्पूर्ण होता है। सभी स्त्रिया बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ यह व्रत अपने पति की लंबी उम्र और अखण्ड सौभाग्य के लिए करती है। इस दिन भालचंद्र गणेश जी की पूजा की जाती है। इस दिन स्त्रियाँ दिन भर निर्जला व्रत कर रात को चांद को अर्ध्य देने के बाद कुछ खाती है।

पूजन की सुरुआत सुबह सुर्य निकलने से पहले स्नान करने के बाद सरगी खा के की जाती है। शाम को स्त्रियां सोलह शिंगार कर समूह में व्रत की कथा सुनती है व थाली बदल कर पूजन करती है।

 

करवा चौथ 2018 व्रत  का दिन व मुहूर्त  कब है?

वर्ष 2018 मे करवा चौथ का दिन, तारीख तथा महुरत (Karwa Chauth Vrat): इस साल 2018 मे करवा चौथ का व्रत 27 अक्टूबर 2018, शनिवार के दिन है. इस दिन पूजन का महुरत 17:48 से 19:04 तक कुल 1 घंटा 16 मिनिट का है वर्ष 2018 मे करवा चौथ का दिन, तारीख तथा महुरत (Karwa Chauth Vrat): इस साल 2018 मे करवा चौथ का व्रत 27 अक्टूबर 2018, शनिवार के दिन है. इस दिन पूजन का महुरत 17:48 से 19:04 तक कुल 1 घंटा 16 मिनिट का है

व्रत की विधि

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी अर्थात उस चतुर्थी की रात जिसमें चाँद दिखाई देने वाला है उस दिन सुबह सूर्य उदय होने से पहले स्नान कर के पति की आयु, सुख व सौभाग्य का संकल्प लेकर दिनभर निर्जला व्रत करे।

पूजन

उस दिन भगवान शिव-पार्वती, भगवान कार्तिकेय, गणेश जी, भगवान कृष्ण एवं चंद्रमा की पूजा करे । पूजन करने के लिए बालू की बेदी बनाकर सभी देवों को स्थापित करे।

नैवेध (प्रसाद)

नैवेध बनाने के लिए शुद्ध घी में आटे को सेककर उसमे शक्कर अथवा खांड़ मिलाकर लड्डू नैवेध के हेतु बनाएं।

करवा

काले मिट्टी में शक्कर की चासनी मिलाकर उस मिट्टी से तैयार किये गए करवे अथवा तांबे के करवे। संख्या में 8 अथवा 10 करवे अपने अनुसार रखे।

पूजन विधि

बालू अथवा सफेद मिट्टी की बेदी पर भगवान शिव-पार्वती, भगवान कार्तिकेय, गणेश जी, भगवान कृष्ण एवं चंद्रमा की स्थापना करें उसके बाद उनकी पूजन करे।

और ये मंत्र पढ़े

“ ॐ शिवाएै नमः ” से पार्वती जी का

“ ॐ नमः शिवाए ” से शिव जी का

“ ॐ षण्मुखाय नमः ” से स्वामी कार्तिकेय का

“ ॐ गणेशाय नमः ” से गणेश जी का

“ ॐ नमः भगवते वशुदेवाय कृष्णाय ” श्री कृष्ण जी का

तथा “ ॐ सोमाय नमः” से चंद्रमा का पूजन करे।

करवो में लड्डू का नैवेध रखकर नैवेध अर्पित करे, एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजा सम्पन करे। करवा चौथ व्रत की कथा पढ़े व सुने।

चंद्रमा उदित हो जाए तो उनकी पूजा कर अर्ध्य देकर ब्राह्मण को दान दे व भोजन करा के स्वम भी भोजन कर ले।

व्रत कथा ( karwa chauth katha )

सावित्री प्रसिद्ध तत्त्‍‌वज्ञानी राजर्षि अश्वपति की एकमात्र कन्या थी। अपने वर की खोज में जाते समय उसने निर्वासित और वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान् को पतिरूप में स्वीकार कर लिया। जब देवर्षि नारद ने उनसे कहा कि सत्यवान् की आयु केवल एक वर्ष की ही शेष है तो सावित्री ने बडी दृढता के साथ कहा- जो कुछ होना था सो तो हो चुका। माता-पिता ने भी बहुत समझाया, परन्तु सती अपने धर्म से नहीं डिगी!

सावित्री का सत्यवान् के साथ विवाह हो गया। सत्यवान् बडे धर्मात्मा, माता-पिता के भक्त एवं सुशील थे। सावित्री राजमहल छोडकर जंगल की कुटिया में आ गयी और पति जैसे वल्कल के वस्त्र पहनते थे वैसे ही पहन लिये और अपना सारा समय अपने अन्धे सास-ससुर की सेवा में बिताने लगी। सत्यवान् की मृत्यु का दिन निकट आ पहुँचा।

सत्यवान् अगिन्होत्र के लिये जंगल में लकडियाँ काटने जाया करते थे। आज सत्यवान् के महाप्रयाण का दिन है। सावित्री चिन्तित हो रही है। सत्यवान् कुल्हाडी उठाकर जंगल की तरफ लकडियाँ काटने चले। सावित्री ने भी साथ चलने के लिये अत्यन्त आग्रह किया। सत्यवान् की स्वीकृति पाकर और सास-ससुर से आज्ञा लेकर सावित्री भी पति के साथ वन में गयी। सत्यवान लकडियाँ काटने वृक्षपर चढे, परन्तु तुरंत ही उन्हें चक्कर आने लगा और वे कुल्हाडी फेंककर नीचे उतर आये। पति का सिर अपनी गोद में रखकर सावित्री उन्हें अपने आंचल से हवा करने लगी।

थोडी देर में ही उसने भैंसे पर चढे हुए, काले रंग के सुन्दर अंगोंवाले, हाथ में फाँसी की डोरी लिये हुए, सूर्य के समान तेजवाले एक भयंकर देव-पुरुष को देखा। उसने सत्यवान् के शरीर से फाँसी की डोरी में बँधे हुए अँगूठे के बराबर पुरुष को बलपूर्वक खींच लिया। सावित्री ने अत्यन्त व्याकुल होकर आर्त स्वर में पूछा- हे देव! आप कौन हैं और मेरे इन हृदयधन को कहाँ ले जा रहे हैं? उस पुरुष ने उत्तर दिया- हे तपस्विनी! तुम पतिव्रता हो, अत: मैं तुम्हें बताता हूँ कि मैं यम हूँ और आज तुम्हारे पति सत्यवान् की आयु क्षीण हो गयी है, अत: मैं उसे बाँधकर ले जा रहा हूँ। तुम्हारे सतीत्व के तेज के सामने मेरे दूत नहीं आ सके, इसलिये मैं स्वयं आया हूँ। यह कहकर यमराज दक्षिण दिशा की तरफ चल पडे।

सावित्री भी यम के पीछे-पीछे जाने लगी। यम ने बहुत मना किया। सावित्री ने कहा- जहाँ मेरे पतिदेव जाते हैं वहाँ मुझे जाना ही चाहिये। यह सनातन धर्म है। यम बार-बार मना करते रहे, परन्तु सावित्री पीछे-पीछे चलती गयी। उसकी इस दृढ निष्ठा और पातिव्रतधर्म से प्रसन्न होकर यम ने एक-एक करके वररूप में सावित्री के अन्धे सास-ससुर को आँखें दीं, खोया हुआ राज्य दिया, उसके पिता को सौ पुत्र दिये और सावित्री को लौट जाने को कहा। परन्तु सावित्री के प्राण तो यमराज लिये जा रहे थे, वह लौटती कैसे? यमराज ने फिर कहा कि सत्यवान् को छोडकर चाहे जो माँग लो, सावित्री ने कहा-यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे सत्यवान् से सौ पुत्र प्रदान करें। यम ने बिना ही सोचे प्रसन्न मन से तथास्तु कह दिया। वचनबद्ध यमराज आगे बढे। सावित्री ने कहा- मेरे पति को आप लिये जा रहे हैं और मुझे सौ पुत्रों का वर दिये जा रहे हैं। यह कैसे सम्भव है? मैं पति के बिना सुख, स्वर्ग और लक्ष्मी, किसी की भी कामना नहीं करती। बिना पति मैं जिना भी नहीं चाहती।

वचनबद्ध यमराज ने सत्यवान् के सूक्ष्म शरीर को पाशमुक्त करके सावित्री को लौटा दिया और सत्यवान् को चार सौ वर्ष की नवीन आयु प्रदान की।

करवा चौथ का उजमन

उजमन करने के लिए एक थाली में तेरह जगह २ से ४ पूड़ी और थोड़ा सा सीरा रख लें, उसके ऊपर एक साड़ी ब्लाउज और रूपए जितना चाहे रख लें| उस थाली के चारों ओर रोली और चावल से हाथ फेर कर अपनी सासू जी के पांव लगकर उन्हें दे देवें| उसके बाद तेरह ब्राह्मणों को भोजन करावें और दक्षिणा दे कर तथा विन्दी लगाकर उन्हें विदा करें|

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